माँ

सौ-सौ राते  जागकर काटती हैं,

फूलों जैसे वो डाटती हैं,
अंधेरों को चीरकर ,
जिदंगी को रौशन कर जाती हैं,
दुनिया में भटके जिसके लिए,
वो जन्नत हैं माँ के कदमों में,
धड़कन सी दिल में बसती है,
माँ फूलों जैसे हँसती हैं,
प्रीत की डोरी से रिश्तो को बँधे रखती हैं,
माँ खुशनसीबों को मिलती हैं,
हर मंजिल का मुकाम हैं,
दुनिया जिसकी गुलाम हैं,
दुर्गा ,काली,लक्ष्मी की मूरत हैं,
वास्तविक प्रेम की सूरत हैं,
जिदंगी की जरूरत है,
खुदा से भी खुबसूरत हैं,
खुदा की परछाई हैं,
जीवन की सच्चाई हैं माँ _jaya singh

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